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नृत्य मनुष्य का रुदन है, कविता उसके आंसू : सचिन श्रीवास्तव


।।नृत्य मनुष्य का रुदन है, कविता उसके आंसू।।

जो लोग कलाओं को “जीवन का उल्लास” कहते हैं, उनके लिए कला महज सजावट है। एक ऐसा खूबसूरत पर्दा, जिसके सामने रहने से भीतर की गरीबी, पीड़ा और टूटन दिखाई नहीं देती। वही मंटो की कहानी जैसा पर्दा।

लेकिन वास्तविक कला पर्दा नहीं, बल्कि खिड़की है। जहां से मनुष्य के निजी और सार्वजनिक दोनों तरह के घाव झांकते हैं। और इसीलिए कला की अभिव्यक्ति शोक से ही संभव है। क्योंकि कला मनुष्य के दुख का मानवीय रूपांतरण है। उल्लास उसका बाहरी आवरण। दुख की मिठाई पर लपेटा गया चांदी का वर्क।

उल्लास को बेचने वाली दुनिया कला को “खुशी का उत्पाद” बनाकर पेश करती है। उनके लिए कविता प्रेम-पत्र है, तो संगीत मनोरंजन, नृत्य उत्सव है तो रंगमंच सामूहिक खिलखिलाहट। लेकिन मनुष्य का जीवन महज उत्सव नहीं है। यह संघर्ष, हंसी, आंसू, उपलब्धि, टूटन, उदासी से मिलकर बना है। तो साफ है कि कला मूलतः शोक का विस्तार है। दुख, निराशा, असहायता और संघर्ष का रूपांतरण।

नृत्य को हम अक्सर “आनंद” की देहभाषा मान लेते हैं। लेकिन दर हकीकत नृत्य मनुष्य के शरीर में जमा दबाव का विस्फोट है। दबाव, जो शब्दों में उतर नहीं पाता। जैसे लंबे समय तक पीठ पर बोझ उठाने वाले शरीर से वजन हटने के बाद की अंगड़ाई। कभी थिरकन में, कभी कंपन में, कभी तीव्र गति में, कभी धीमे-धीमे झुकने में। एक मनुष्य पूरे दिन मशीन की तरह काम करने के बाद किसी लोक-नृत्य में शामिल होता है, तो वह खुशी नहीं मना रहा होता, वह अपने भीतर की टूटन को कुछ देर के लिए भुलाने, या उसे सहने योग्य बना रहा होता है। इसलिए नृत्य “उत्सव” नहीं, जीवन का रुदन है, जहां आंसू शरीर से बहते हैं।

इसी तरह, कविता मनुष्य की सबसे पुरानी आत्म-रक्षा है और कागज शोक की कब्रगाह नहीं, बल्कि उसका जीवित प्रमाण हैं। गौर से देखिए तो प्रेम कविता में भी इश्क का उल्लास कम और प्रेम की कमी, असुरक्षा, असफलता, दूरी, भय अधिक लिखे होते हैं। इसलिए कविता करुणा में ही अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में अभिव्यक्त होती है। करुणा के अलावा लिखी गई हर काव्य पंक्ति महज एक शोर है।

कला का उल्लास वाला भ्रम इसलिए उपयोगी है कि अगर कला को महज “खुशी” बना दिया जाए, तो वह बाजार के लिए बिकाऊ हो जाती है। तब कविता इंस्टाग्राम की प्रेरक पंक्तियां बन जाती है, संगीत बैकग्राउंड नॉइज और नृत्य एक रील का कंटेंट। यह कला की हत्या है। क्योंकि कला, सच्ची कला मनुष्य को उसके दुख से जोड़ती है, वजह समझाती है, और उसे प्रतिरोध में बदलती है। उत्साह की आड में वह कला लाइक्स में बदल जाती है या किसी रियल्टी शो के शोर में भीग जाती है।

।।और अंत में।।
हालांकि कला महज दुख नहीं है, लेकिन कला की सबसे सघन ऊर्जा दुख से निकलती है। उल्लास है भी तो वह संघर्ष को जीतने का उल्लास है, सहज अभिव्यक्त नहीं। जैसे एक लंबे आंदोलन के बाद मिली जीत का गीत, या किसी अपमान के बाद उठ खड़े होने का नृत्य। यह उल्लास भी शोक की राख से जन्मता है।

नोट : यह पोस्ट प्रिय एमसीयू के प्रिय अग्रज और फक्कड़ मिजाज़ सचिन सर के फेसबुक वाल से साभार ली गई है। 


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