मेरी आवारगी

हम सबके किरदार कुछ और जिंदगियों को रौशन करें ; जन्म दिवस शुभ हो सखी


हम सबके किरदार कुछ और जिंदगियों को रौशन करें ; जन्म दिवस शुभ हो सखी


प्रिय सखी, 

आज तुम्हारे जन्म दिवस पर तुम्हें यह पत्र संप्रेषित करते हुए मुझे बहुत हर्ष हो रहा है। क्योंकि जीवन तुम्हारे साथ रंग बिरंगा है। आज तुम्हें इस पत्र के सहारे जन्म दिवस पर तुम्हें दिल से शुक्रिया है। मेरे शब्द ही मेरी पूंजी हैं। बस इन्हीं के सहारे मैं तुम्हें यादों का गुलदस्ता सौंप रहा हूं। न जाने कितनी बातें हैं, जो तुमसे कभी कही नहीं। आज तुम्हारे जन्म दिवस पर उन्हीं में से एक का जिक्र करना चाहता हूं। क्योंकि हम कितना भी कह- सुन लें। दरअसल जीवन में बहुत कुछ अनकहा और अनसुना रह ही जाता है। 

प्रिय सखी, 

मेरे साथ बीते कुछ साल खासतौर पर तुम्हारे लिए  काफी संघर्ष भरे रहे हैं। बस मेरा साथ देने के लिए तुमने जीवन में जितनी कठिनाईयों का सामना किया है, उतना सबके लिए कर पाना सरल नहीं है। मैं तो ये स्वयं को तुम्हारी जगह रखकर देखूं, तो मुझे बड़ा असहज महसूस होता है। लगभग हर दूसरा शख्स पढ़ लिखकर महानगर और विदेश का रुख करने में लगा रहता है। मौजूदा समय महानगरों की धूल फांकने के बाद सतना जैसे छोटे शहर को स्थायी ठिकाना बनाने का फैसला मेरे जैसे बुड़बक लोग ही लेंगे और ऐसे फैसले को सिर माथे पर रखकर स्वीकार करने वाले तुम्हारे जैसे विरले ही होंगे। 

प्रिय सखी, 

अपना जमा जमाया पेशेवर जीवन एक झटके में छोड़ देना, पांच अंकों वाला सैलरी फिगर अस्वीकार करते हुए सीधे चार अंकों की मासिक दिहाड़ी को स्वीकार कर लेना ये सब सामान्य नहीं है। अपने सपनों को पीछे छोड़कर आपके फैसले का सम्मान करना इतना आसान नहीं होता है। लेकिन ये सब तुमने ना सिर्फ कर दिखाया है, बल्कि तुम इससे लगातार दो - चार होने के बाद भी कभी उकताई नहीं। तुमने यहीं रहकर अपने पेशेवर जीवन के उतार चढ़ाव लगातार झेले। इसके लिए तुम्हें सलाम है। 

प्रिय सखी,

तुम्हें लिखने पर आऊंगा, तो लिखता ही चला जाऊंगा। क्योंकि मेरे फैसले को तुमने एक बार में स्वीकार कर लिया। आज हमें भोपाल से विदा लिए लगभग छह साल से ज्यादा समय बीत गया है। इस बीच जीवन की नैया कई बार डगमग डगमग हुई, लेकिन तुमने कभी हार नहीं मानी। मुझे कभी यूं भी लगा कि फिर अपनी दुनिया में वापस लौट जाना चाहिए, तो तुमने मेरे लिए यहीं एक खूबसूरत दुनिया बसा दी। तुम मेरे कदम से कदम मिलाकर चलती रही। तुमने बहुत हिम्मत दी। मेरा हौसला बनी। मेरे संघर्ष को हर कदम पर सराहने के साथ - साथ मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहीं। पत्रकारिता छोड़ना मेरे लिए इतना आसान निर्णय नहीं था, लेकिन तुम्हारे साथ ने इसने बहुत सरल बना दिया। 

यूं भी ये जीवन की डगर इतनी आसान नहीं है। ऐसे में तुम्हारे जैसी सखी को पाकर जीना बहुत आसान हो जाता है। एक बार फिर तुम्हें जन्म दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। 

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को विराम देता हूं। उम्मीद कि जीवन को सरल और सहज बनाने में हम अपनी-अपनी भूमिकाएं यूं निभाते रहेंगे। क्योंकि जीवन के इस रंगमंच पर कठपुतलियां का खेल सदा यूं ही चलता रहेगा। इसलिए हम सबके किरदार कुछ और जिंदगियों को रौशन करें मां जगदम्बा से यही प्रार्थना है। 

- तुम्हारा सखा

© दीपक गौतम

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