यही मुनासिब है आदमी के लिए कि वक़्त के साथ चलता रहे....!!
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वक़्त में मौसम के लिहाज से भले कोई बदलाव न हो मगर तारीख़ 2025 को बीता इतिहास बना कर 2026 को आज़माने चंद घंटों में मुखातिब है। जब अख़बार में काम काज था तब कुछ न कुछ इस मौके पर छौंका जरूर लगाया जाता था। मगर अब वो दौर बीत रीत गया। यूँ तो रीता बहुत कुछ है बीते दिनों। इक छटपटाहट भी अन्तस् में हरकत करती रहती है मगर इसका कोई उपाय नहीं...और जब आप निरुपाय हो जाएं तो सब छोड़ते जाना ही बेहतर होता है। रोज़ कुछ न कुछ छूटता है, कचोटता भी है, मग़र वक़्त का मिज़ाज बड़ा बेरहम है। उसकी अपनी तयशुदा गति है, जिस पर वह अखंड गतिमान है... हमारे न होने के पहले से और न होने के बाद भी।
जीवन को पीछे मुड़ कर देखें तो हमारे, आपके और हर एक जीवन में सोचने, सीखने, कहने बताने के लिए कितना कुछ कच्चा पक्का अनुभव निहित है। सुख के पलों की उम्र बेहद छोटी और तकलीफ का वक़्त पहाड़ सा मालूम होता है। आज के युग मे एक परिवार तक सिमट आये जीवन मे तो इस बात की भयावहता और भी बड़ी है। फिर भी जीवन बड़ा जीवट और निष्ठुर है। सब सह कर भी कभी रेंगता है, तो कभी दौड़ता है और कभी- कभी कम ही सही पर कुलांचे भी मारता है। लेकिन वक़्त के साथ साथ जीवन से उत्तरोत्तर स्वाभाविकता का ह्रास होता जा रहा है, जो मूलतः मनुष्य की प्रकृति से बेमेल है। शायद इसीलिए जीवन रसभरा होने के बाद भी रसहीन नज़र आता है। जीवन मृत्यु के इस नियत सफर में हमने जोड़ने की वृत्ति बढ़ाई है जबकि छोड़ने की वृत्ति होनी चाहिए। धरती पर भौतिक जीवन की उम्र कुछ ज्यादा ही छोटी है। लेकिन अमर होने के भरम में जीने की आदत का क्या कहें। बहरहाल, इतना कौन पढ़ेगा जितना दरमियाँ रात लिखते जा रहा हूँ। पर ये सोच कर कम न लिखा जाएगा कि इसे कौन पढ़ेगा कौन नहीं? हां तो गियर बदलते हुए आगे लिखा है कि....
प्रेम बुरी तरह प्रदूषित है। इसका सुख से सीधा कनेक्शन है। दुःख मुक्त प्रेम की कल्पना सर्वव्यापक है। थोड़ी सी बात मन की न हुई तो वही शख्स इक पल में फालतू दिखने लगता है और बात मन की हुई तो वही शख्स कमाल हो जाता है। अब लीजिये एक शेर और लिखते वक्त याद आ गया हालांकि यहां कुछ बेमेल सा है पर अभी क्या मेल क्या बेमेल....नया साल है सो जो याद आये लिखो पेलमपेल😊.....तो शेर यूँ है कि....
तोड़ो फेंको रखो करो कुछ भी,
दिल हमारा है क्या खिलौना है।
अधिकार की मांग हर जगह, हर वक़्त है, मगर कर्तव्य की बात तूती की आवाज़ बन कर रह गयी है। सहनशीलता के भाव में सर्वाधिक गिरावट दर्ज हो चुकी है। अहंकार आसमान पर है। स्वास्थ्य पर खतरा हर पल है। कोरोना ने जैसी कलह दुनिया मे मचाई है और गम दिए हैं उसका मुकम्मल उत्तर एक दशक तक खोजना मुश्किल है। टीके के बाद हार्ट अटैक की छोटी उम्र में बढ़ती घटनाओं ने कॅरोना के टीके को सवाल के कटघरे में खड़ा किया है। तो गमों से भरी इस दुनिया मे लड़ने का माद्दा कृष्ण बिहारी नूर लिखते कहते हैं कि ....
मिरे गम मेरे साथ बहुत दूर....तक गए,
मुझमे थकन न पाई तो बेचारे खुद थक गए।
इसलिए अब यह कह कर बात खत्म की जाय कि
अब यही मुनासिब है हर शख्स के लिए,
कि वह वक़्त के साथ - साथ चलता रहे।
इस नए तारीखी वक़्त में मौन संकल्प लें किसी से प्रकट न करें और उन पर शिद्दत से अमल करें।
*नए* *वर्ष* की सभी मित्रों को अनेक-अनेक शुभकामनाएं।
@श्रीश

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